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Jaag Piyari Ab Ka Sove
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Jaag Piyari Ab Ka Sove

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जाग प्यारी अब का सोवै      संत मत -८

हम सब अकार से बंधे है i हमारा विचार, हमारा व्यवहार सब अकार से है i हमारे नाते, हमारे रिश्ते, हमारी सोच सब आकार से सम्बंधित है i लेकिन जागना उसको कहोगे जिसमे अपने भीतर स्थित निराकार का बोध पैदा हो जाए, अपने भीतर स्थित गोविन्द का बोध पैदा हो जाए i उसी को हम जागना कहेगे i

जागे तो हम है, लेकिन इसको जागना हम नही कहेगे i इसको असली जागरण नहीं कहेगे i असली जागरण का अर्थ है आत्म स्मरण i अपने निराकार, अपने चैतन्य का स्मरण i

सारा संसार सो रहा है वेहोशी में, मूर्च्छा में, लेकिन जागरण उस पल आ जाएगा, जब तुम अपने चैतन्य के प्रति जागो I अपने भीतर स्थित निराकार के स्मरण के साथ जिंदगी को जियो I कहते है कबीर साहब -

'जिन जागा, तिन माणिक पाया , ते बौरी, सब सोच गँवाया I I

सो कर, बेहोशी में, मूर्च्छा में , वह माणिक, वह राम रतन धन ऐसे ही गंवा रहे हो, ये जिंदगी की रात जो है, ये बीती चली जा रही है I आयु घटती चली जा रही है I

'पल पल छीजै अवधि दिन आवै I '

मूर्च्छा में, बेहोशी ने, नींद में, तमस में सो रहे है सब I बेखबर सो रहे है उस गोविन्द के प्रति ; जिसके प्रति जागते हुए जिंदगी को जिए, तो जिन्दगी धन्य हो जाती है I

साधको के लिए इन प्रवचनों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है I सद्गुरु ने स्वयं इनका संपादन एवं संशोधन किया है I

 

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