Skip to product information
1 of 1

Chaukhamba Prakashan

Shribhavishya Mahapuranam (3 Volume set) [Hindi]

Shribhavishya Mahapuranam (3 Volume set) [Hindi]

Regular price ₹ 3,150.00
Regular price ₹ 3,500.00 Sale price ₹ 3,150.00
Sale Sold out
Shipping calculated at checkout.
Quantity

Item Code: KAB2107

ISBN: 9788170847328

भविष्यपुराण से सम्बन्धित अपना मत लिखने के पूर्व यह कहना आवश्यक है कि विद्वानों का कथन है कि 'इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपब्रम्हयेत ”कि इतिहास तथा पुराण वेद के उपबृंहित रूप हैं। यहाँ इतिहास तथा पुराण इन दो शब्दों का प्रयोग ध्यान देने योग्य तथ्य है। दोनों एक ही अर्थ के द्योतक नहीं हैं। इतिहास अलग और पुराण उससे अलग है। बृहदारण्यकउपनिषद्‌ के शांकरभाष्य के अनुसार जगत्‌ के प्रारम्भ की अवस्था से लेकर सृष्टि कार्य का प्रारम्भ होने तक का वर्णन पुराण है। अर्थात्‌ पहले कुछ नहीं था, असत्‌ था इत्यादि सृष्टि पूर्व का वर्णन ही पुराण है। तदनन्तर जो कथा तथा संवादात्मक धारा चली, वह इतिहास है। वायुपुराण में “पुराण” शब्द की व्युत्पत्ति है पुरा (प्राचान--पहले) तथा अन्‌ धातु साँस लेना अर्थात्‌ जो अतीत में जीवित है। जो प्राचीन काल में साँस ले रहा है, वह पुराण है। पद्मपुगाण के अनुसार “जो अतीत को चाहे, वह पुराण है।””

पुराणों का महत्त्व हमारे यहाँ वेदों से कदापि कम नहीं है। वेदोक्त अतीव गूढ़ तथा रहस्यावृत मन्त्रों का सरलीकरण तथा उनको जनसामान्य के लिए उपयोगी बनाने का महान्‌ कार्य पुराणों द्वारा किया गया है। शतपथ ब्राह्मण का कथन है कि पुराण वेद ही हैं। यह वही है।' तैत्तिरीय आरण्यक में पुराण हेतु बहुवचन का प्रयोग है, अर्थात्‌ इससे कई पुराणों की स्थिति का द्योतन होता है।'  कोौटिल्य ने अपने ग्रन्थ “अर्थशात्र” में कहा है कि वेदत्रयी के अतिरिक्त इतिहास भी वेद है।'

विद्वान शबर (२०० ई० से ३०० ई० के बीच), कुमारिल (सप्तम शती ई०), आचार्य शंकर (सप्तम शती अथवा अष्टम शतती) ने भी पुराण शब्द का व्यवहार पुराणों के सम्बन्ध में किया है। बाणभट्ट (सप्तम शती) ने भी पुराणों का उल्लेख किया है। अलबरूनी ने (१०३० ई०) अपने ग्रन्थ में पुराण सूची का उल्लेख किया है। तथापि पुराणों को इन पाश्चात्य बुद्धि से उपजी काल सीमा में बाँधा जाना उचित नहीं है। इनके पश्चात्‌ के संस्करणों की संरचना के आधार पर जो इनका कालमान तय किया जाता है वह वस्तुत: उन पुराणों के उन मूलभागों की अनदेखी करके किया जाता है, जिनमें कालजनित परिवर्तन तथा परिवर्द्धन नहीं है। तथापि यहाँ पुराणों का काल निर्धारण करना मेरा उद्देश्य नहीं है। भविष्य के अनुत्सन्धित्सु जिज्ञासु वर्ग के लिये यह एक दिशा संकेत मात्र है कि पुराणों के काल के निर्धारण में पाश्चात्य चश्मे तथा उनके मानदण्ड की जगह स्वदेशी एवं स्वतन्त्र दृष्टिकोण को अपनाया जाये। भारत के श्रद्धालु वर्ग के अनुसार ये पुराण सनातन काल से चले आ रहे हैं। उनका मूलतत्त्व एक हजार वर्ष ही पुराना नहीं है। वह तो शाश्वत अतिप्राचीन है। तदनुसार मानव वानर का विकसित रूप नहीं है। वह सृष्टि के प्रारम्भ से ही रहा है। जो लोग स्वयं को वानरों का विकसित रूप डार्विन के विकासवाद के अनुसार मानते हैं, उनकी वानरी प्रज्ञा ही पुराणों को एक हजार वर्ष प्राचीन मानती है। हम आर्य वंशज वानरों की सनन्‍तान न होने के कारण इसे अनादिकालीन मानते हैं। इस सम्बन्ध में आस्था तथा श्रद्धा ही

विजयिनी है। 

Author
Language
ISBN
View full details