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Rom Rom Ras Pijiye
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रोम - रोम रस पीजिए

महर्षि पंतजलि कहते है - ' तस्य वाचक: प्रणव: I ' अर्थार्त परमात्मा का बोधक तत्व ओंकार है I यह ओंकार सारे अस्तित्व में नाद के रूप में गूंज रहा है, चैतन्य के रूप में जीवित है, प्रेम के रूप में तृप्तिदायी है I ओंकार का यह प्रेम तत्व ही राम रस है I

संत कहते है कि राम- राम न केवल रोम - रोम से पीना है, बल्कि रोम- रोम में  बसा लेना है I

राम रस की कला ओशोधारा के सुमिरन कार्यक्रमो में बतायी जाती है I यहां कुछ इशारे किये जा सकते है -

' तुम रोम- रोम में राम बसा लो काम विदा हों जाएगा I

जैसे प्याले में रस भर लो, वातास विदा हों जाएगा I

छोड़ो प्रप्रंच आराम करो, अब अनहद में विश्राम करो I

 

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