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Prem Upnishad
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प्रेम उपनिषद

हमारे युग के सबसे बड़े विद्वान जगतगुरु कृपालु महाराज राधा के भक्त रहे I वे सगुण कृष्ण को भगवान का अवतार मानते है और राधा को उनकी शक्ति I बहुधा वे 'राधे- राधे’ कहते रहे I अन्य निर्गुण संतो की तरह अद्वैतवादी होने के कारण कृष्ण को मैं परमात्मा का नहीं, बल्कि विष्णु के अवतार के रूप में देखता हु I इसलिए कृपालु महाराज के 'राधे-राधे ' का अक्सर मैं मजाक उड़ाता रहा I

एक दिन मुझे लगा कि राधा परमात्मा की शक्ति भले न हो, मगर प्रेम की शक्ति तो है ही I फिर प्रेम की शक्ति तो परमात्मा की ही शक्ति है I ऐसा लगा कि कृपालु महाराज स्वर्ग से उत्तर आए है और मुझे देखकर हंस रहे है I मैं उनसे इस तरह हंसने का कारण पूछता हु I वे कहते है -' तुमने मेरा इतना मजाक उड़ाया है कि यह तुम्हारा कर्मबंध हो गया है I ' मैं पूछता हु - ‘अगर ऐसा है तो इस कर्मबंध से मुक्ति का उपाय क्या है ? वे कहते है - ' राधा प्रेम स्वरुप है I राधा -कृष्ण संवाद के माध्यम से 'प्रेम उपनिषद' लिखो I उसमे खुद 'राधे -राधे ' कहो और सबसे कहलाओ भी I मैं राजी हो गया I अब ' प्रेम उपनिषद ' आपके हाथो में है I इसमें जो दृष्टि है, वह मेरे सद्गुरु ओशो की है

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