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Meer Ki Shayri
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Meer ki Shayri [Hindi]

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Meer Ki Shayri

मीर की शायरी

  दर्द की असीम गहराइयों को अपने रोम - रोम में

 समेटे अनमोल कलाम का खूबसूरत गुलदस्ता

वक्त की मार तराशती है आदमी को और इस तराशे हुए हीरे को ही कहा जाता है - शायर l तभी तो उसमें धार होती है और होती है चमक l मीर तकी 'मीर' ने जिंदगी को बड़ी गहराई तक महसूस किया था l  जिंदगी के बहरूपियेपन की झलक मीर के एक - एक शे'र में मिलती है l पारखी और उस्ताद शायरों ने मीर को 'खुदा -ए - सुखन' की पदवी से ऐसे ही नहीं नवाजा था l 'मीर' बस मीर थे - मीर यानी सरदार l

उनके बारे में जौक कहते है -

न हुआ, पर न हुआ 'मीर' का अंदाज नसीब

'जौक' यारों ने बहुत जोर गजल में मारा

जबकि मिर्जा ग़ालिब फरमाते है -

अपना भी यह अक़ीदा है, बकौले 'नासिख़'

आप बे -बेहरा है, जो मौतकीदे ' मीर' नहीं

जनाब हसरत अर्ज करते है -

शे'र मेरे भी है पुरदर्द वलेक़िन 'हसरत'

'मीर' का शेवा - ए - गुफ़्तार कहा से लाऊ

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