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Daampatya Sukh - Astrology and Marriage [Hindi]

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दाम्पत्य सुख (ज्योतिष के झरोखे से)

ज्योतिष शास्त्र का विषय सूक्ष्म और गहन है, इसका प्रयोजन भविष्य की घटनाओ का परिचय कराना ही नहीं, अपितु परिचय देकर लाभ कराना भी है l जीवन में हम अनेक लोगो के संपर्क में आते है l माता - पिता के पश्चात व्यक्ति का निकटतम सम्बन्ध पत्नी के साथ रहता है, इस सम्बन्ध का प्रभाव केवल मनुष्य के जीवन तक  ही नहीं, अपितु उसके वंश की आगामी कई पीढ़ियों तक चलता है, क्योकि संतान परम्परा में पूर्वजो के गन- दोष किसी न किसी रूप में विधमान रहते है l

दाम्पत्य जीवन सुखमय रहेगा या दुखमय, और इसे कैसे सुखमय बनाया जा सकता है, यह प्रश्न एक गंभीर चुनौती के रूप में भारतीय जन -मानस को आंदोलित करता रहा है l ज्योतिष शास्त्र के मनीषी आचार्यो ने प्राचीन काल में ही इस प्रश्न का भली भाँति विचार किया था और उन्होंने सुखमय दाम्पत्य जीवन के लिए उपयुक्त वर -वधु का चुनाव, उनके गुण दोषों का विचार, उनकी प्रकृति एवं अभिरुचियों में समानता की पहचान तथा उनके आपसी पुरकत्व भाव का पृथक - पृथक रूप से गम्भीरतापूर्वक विचार कर उन सिद्धान्तों एवं नियमो का प्रतिपादन किया जिनके द्वारा न केवल दाम्पत्य सम्बन्धों का ही, अपितु दाम्पत्य जीवन के समस्त पहलुओं को सरलतापूर्वक जानकार समाधान किया जा सके i

विवाह सम्बन्धो में मंगल ग्रह का लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, और द्वादश स्थानों में होना हानिकारक है, इस ग्रह के उक्त स्थानों में होने के कारण कई शिक्षित, सुन्दर कुलीन, एवं समृद्ध युवको के विवाह नहीं हो पाते और कितनी ही सर्वगुण सम्पन्न कन्याएँ, अविवाहित रह जाती है i इस ग्रन्थ में मंगल के इस प्रभाव का भली भाँति विवेचन किया गया है i 

 

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