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Astha Prakashan

Parlok Vigyan [Hindi]

Parlok Vigyan [Hindi]

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Item Code: KAB1775

परलोक का मुख्य माध्यम मृत्यु है। जब तक मृत्यु नहीं हो जाती तब तक परलोक के दर्शन नहीं हो सकते; किन्तु वेद, तन्त्र भली-भाँति यह उद्घोष करते हैं कि विना मृत्यु को प्राप्त हुए भी परलोक तथा परलोक के विज्ञान को जाना जा सकता है। योग-तन्त्र की सभी शाखाओं का दर्शन एक ही मत में समाहित है, वह यह कि मृत्यु को प्राप्त हुए विना ही परलोक के विज्ञान को जाना-समझा जा सकता है।

प्रस्तुत पुस्तक में आदरणीय पं० अरुण कुमार शर्मा जी ने मानवों की परलोकसम्बन्धी जिज्ञासाओं का भली-भाँति समाधान किया है तथा कुछ ऐसे रहस्यों को आनवृत भी किया है, जो अभी तक रहस्य ही बने हुए थे; किन्तु इस पुस्तक को पढ़ने के बाद पाठकों की परलोकसम्बन्धी सभी जिज्ञासायें शान्त हो जायेंगी--ऐसा मुझे अनुमान ही नहीं; वरन्‌ पूर्ण विश्वास भी है। सौभाग्य से मुझे इस पुस्तक को सम्पादित करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। इस कठिन कार्य में मैं कहाँ तक सफल रहा हूँ, यह तो मैं नहीं जानता; किन्तु आदरणीय गुरुदेव के आशीर्वाद से ही मैं इस कार्य को सम्पादित कर सका हूँ।

श्रद्धेय पं० अरुण कुमार शर्मा जी से मेरा परिचय सन्‌ १९८५ के लगभग हुआ था और तभी से उनके आशीर्वचनों की निरन्तर वर्षा मुझ पर होती रही है। तन्त्रसम्बन्धी जिज्ञासाओं को लिए मैं सदैव ही यत्र-तत्र शोध हेतु विद्वज्जनों के सम्पर्क में रहने का प्रयास करता रहता था। इसी बीच ईश्वरेच्छा से आदरणीय शर्मा जी का सत्रिध्य प्राप्तहुआ और अपनी अनेक जिज्ञासाओं के उत्तर भी प्राप्त हो गए। एक दिन इसी भाँति में शर्मा जी के आवास पर सायंकाल पहुँचा। शड्भा समाधान हेतु मन में अनेक प्रकार के प्रश्नों का अम्बार था, किन्तु जाते ही एक प्रश्न भी नहीं कर सका; क्योंकि जा कर बैठते ही आदेश हुआ कि तुम्हें परलोक विज्ञान का संकलन  कर उसका सम्पादन भी करना है। संकलन  तक तो मेरे वश में था; किन्तु सम्पादन मुझ जैसे अल्पमति के लिए अत्यन्त दुष्कर ही नहीं; वरन्‌ असम्भव भी था। मैंने शर्मा जी से निवेदन किया कि संकलन  तो समझ में आता है, किन्तु जो कुछ आपने लिखा है, उसमें मैं अकिंचन  भला क्या सम्पादन कर सकता हूँ? शर्मा जी ने कहा कि मुझे आशा ही नहीं, विश्वास है कि तुम ही इस कार्य के लिए उपयुक्त हो तथा यह कार्य तुम्हें ही करना है।

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