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Jyotish Dwara Ashubh Grahon ka Upchaar [Hindi]

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ज्योतिष वेद पुरुष का नेत्र है…'ज्योतिषम  वेद चक्षु:। ज्योतिष शास्त्र में प्राणियों की  जन्मकाल संबंधी ग्रहस्थिति से  उनके जीवन में घटित होने वाले शुभाशुभ कार्यों  का निदेश क्रिया गया है । वराहमिहिर कहते है-' 'पूर्व जन्म में जो शुभाशुभ कर्म किया जाता है, उसको यह शास्त्र उसी प्रकार स्पष्ट का देता है, जिस प्रकार घनान्धकार  में अदृश्य पदार्थों को दीपक प्रकाशित कर देता है ।" इस शास्त्र के अन्तर्गत उस समूची प्रक्रिया का प्रतिपादन आ जाता है, जिससे मनुष्य के जीवन में आने वाले हर्ष-विषाद, हानि-लाभ , उत्थान- पतन  आदि को पहले  से ही जाना जा सकता है । अत: यह सिद्ध हो जाता है कि मनुष्य को शुभाशुभ फल उसके पूर्व जन्मकुत कर्मों के फलस्वरूप ही मिलते है। 

हमारे ज्योतिष ग्रन्धों में ग्रहोपचार हेतु उपाय भी बताए गए है, जिससे मनुष्य अशुभ ग्रहों के कुप्रभाव से बचकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत का सके। ग्रन्धों से 'मन्त्र, मणि औषधि' का ग्रहोपचार  हेतु उल्लेख क्रिया गया है । औषधि,दान, जप, होम की सार्थकता भी निम्न श्लोक में दर्शायी गई है- 

जन्मान्तर कृतं पापं व्याधिरूपेण बाध्यते  ।

तच्छान्तिरौषधैर्दान जप होम कृतादिभि: । । 

प्रस्तुत पुस्तक में अशुभ ग्रहों के उपचार हेतु दान, जप, व्रत , पूजा - अर्चना ,मंत्र , यंत्र, रत्न आदि का विस्तारपूर्वक विवेचन क्रिया गया है । ग्रहोपचार सम्बन्धी ऐसी पुस्तक बाजार में अभी तक देखने में नहीं आई । आशा है, यह पुस्तक ज्योतिर्विदों  के लिए तो उपयोगी सिद्ध होगी ही, सामान्य पाठक भी इससे लाभ उठाकर अपना जीवन सानन्द व्यतीत कर सकेंगे ।

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